बादशाहपुर, 20 मई, (अजय) : देश में बढ़ती आवारा और आक्रामक कुत्तों की घटनाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि लोगों को बिना डर के जीने का अधिकार सर्वोपरि है। अदालत ने कहा कि ऐसे खतरनाक और हिंसक प्रवृत्ति वाले कुत्ते आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं और इस विषय पर जारी आदेशों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि संविधान नागरिकों को सुरक्षित जीवन का अधिकार देता है। यदि कोई व्यक्ति सड़क पर चलते समय लगातार किसी हमले या खतरे के भय में जीने को मजबूर हो जाए तो यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि पशु कल्याण महत्वपूर्ण है, लेकिन इंसानी जीवन और सुरक्षा उससे ऊपर है। सुनवाई के दौरान देशभर में कुत्तों के काटने की घटनाओं के आंकड़ों पर भी चर्चा हुई। रिपोर्टों के अनुसार हर वर्ष लाखों लोग डॉग बाइट का शिकार होते हैं। सबसे अधिक प्रभावित बच्चों और बुजुर्गों को माना गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल आवारा कुत्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि बिना नियंत्रण पाले गए आक्रामक नस्ल के कुत्ते भी कई बार खतरा बन जाते हैं। अदालत ने पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी सवाल उठाए। न्यायालय ने माना कि नसबंदी और टीकाकरण योजनाओं का सही तरीके से पालन न होने के कारण समस्या लगातार बढ़ रही है। कई नगर निकायों और प्रशासनिक संस्थाओं पर भी निर्देशों को गंभीरता से लागू न करने के आरोप लगते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कुत्तों को हटाने या पकड़ने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए दीर्घकालिक योजना, नियमित नसबंदी अभियान, टीकाकरण, जिम्मेदार पालतू पशु नीति और स्थानीय प्रशासन की सक्रिय भूमिका जरूरी है।अब इस फैसले के बाद स्थानीय निकायों और प्रशासनिक एजेंसियों पर जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वे आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करें और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाएं।
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