वर्तमान सरकार की उपलब्धियां में से एक बड़ी उपलब्धि यह भी गिनाई जाती है कि सरकार ने पुराने संसद भवन के साथ-साथ एक नए तिकोने आकार का संसद भवन के निर्माण किया I यह सरकार का एक ड्रीम प्रोजेक्ट था I 64500 वर्ग मीटर में बनी इस तीन मंजिला इमारत का निर्माण देश की प्रतिष्ठित कंपनी टाटा प्रोजेक्ट द्वारा किया गया और इसके निर्माण में सरकार का लगभग 1200 करोड़ रुपए का खर्चा आया और मात्र 21 महीने की समय सीमा में विश्व के अति आधुनिक भावनाओं में दर्ज इस भवन का निर्माण किया गया सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी यह भवन दुनिया के सभी सुरक्षित भवनों में से एक है I इसमें कुल सांसदों के बैठने की क्षमता लोकसभा में 888 और राज्यसभा में 384 सदस्यों की है I यह क्षमता भविष्य में संसद के परिसीमन में होने वाली सीटों की क्षमता में बढ़ोतरी को ध्यान में रखकर बनाई गई है आप सोच रहे होंगे कि आज लगभग 3 साल बाद मुझे यह बातें क्यों याद आ रही हैं I इस भवन के उद्घाटन समारोह से लेकर वर्तमान बजट सेशन तक का यदि आप आकलन करें तो आपको लगेगा कि जिस प्रकार देश के भविष्य का निर्माण करने वाले ये सांसदगण अपना व्यवहार नहीं बदल पाए तो ऐसा लगता है कि इस भवन के निर्माण में खर्च की गई राशि व्यर्थ ही गई I इसमें बैठने वाले लोकसभा व् राज्यसभा के सांसद अपने आचार विचार और व्यवहार में यदि कोई सुधार जो कि नहीं कर पाए तो इससे बेहतर तो यह था कि पुराने भवन में लड़ते झगड़ते रहते I पिछले लगभग 30 साल से जब से जब से लोकसभा व् राज्यसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है अनेकों अनेकों बार यह कार्रवाई देखने का मुझे दूरदर्शन के माध्यम से शौक है I सांसदो के संसद में व्यवहार में 2019 के बाद जो गिरावट आई है उसको शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता I ऐसा नहीं इससे पूर्व में सत्तारूढ़ दल व विपक्ष के बीच मुद्दों को लेकर मतभेद नहीं होता था I अलग-अलग विचारधारा के आए लोगों के बीच नीति व मुद्दों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है , किंतु वह मतभेद इस हद तक हो जाए कि उसको प्रकट करने वाला व्यक्ति संसद की मर्यादा व शालीनता को भूल जाए ,ऐसा पहले कभी नहीं देखने को मिला I 2024 के बाद तो ऐसा लगने लगा कि यह विपक्षी दल नहीं है अपितु विरोधी दल है I सरकार की किसी भी बात से सहमत ना होना और असहमति को अभद्र तरीके से व्यक्त करना मानो इन विरोधियों की आदत सी बन गई है I हाल ही में तो विपक्षी दलों ने शालीनता की सारी सीमा त्याग दी जब कई महिला सांसद ने इकट्ठा होकर प्रधानमंत्री का घेराव तक कर डाला I स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि लोकसभा के अध्यक्ष महोदय को प्रधानमंत्री से यह प्रार्थना अपनी करनी पड़ी कि वह लोकसभा में ना आए I यदि आएंगे तो अभूतपूर्व ड्रामा करने की साजिश चल रही है I सवाल यह नहीं की कौन सही कौन गलत I बड़ा सवाल यह है कि लोकतंत्र को मंदिर कहलाने वाले उस भवन में बैठे लोगों से जिस आचार संहिता की आम नागरिक अपेक्षा करता है वहां पर उनकी धज्जियां उड़ाई जाती हैं I राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा हो आतंकवादी हमले का मुद्दा हो ,ऑपरेशन सिंदूर हो, SIR, CAA या अन्य कोई भी मुद्दा हो , लगातार 1 घंटे तक ये माननीय शांतिपूर्वक तरीके से संसद की कार्रवाई को सुचारू रूप से नहीं चल चलने देते I इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि जो आज सत्ता में है जब वे विपक्ष में होते थे तो हंगामा तब भी होता था लेकिन संसद की मर्यादा को इतना तार तार होते कभी नहीं देखा I पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव जी, अटल बिहारी वाजपेई जी यहां तक की मनमोहन सिंह जी के समय में भी विपक्ष से मतभेद होता था किंतु शालीनता और मर्यादा के अंदर सीमित होकर होता था I संसद की कार्यवाही एक दिन चलने का देश 10 करोड रुपए के करीब खर्च करता है जो कि आम आदमी की गाढ़ी कमाई से आता है I भारी भरकम सुविधाएं व् वेतन पाने वाले इन सांसदों को इतना एहसास नहीं होता कि इनको यहां पहुंचने में जनता ने वोट के साथ-साथ चुनाव खर्च के माध्यम से हजारों करोड रुपए खर्च किया है I बाकी बात तो दूर रही , संसद में अपनी उपस्थिति को लेकर भी गंभीर नहीं होते देखा गया है I गंभीर मुद्दों पर चर्चा के दौरान भी सांसदों की उपस्थिति पूर्ण नहीं होती और यदि आते भी है तो एक-दो घंटे के लिए, अन्यथा कैंटीन में मिलने वाली सुविधाओं का लाभ उठाते हैं I ऐसा नहीं कि सांसदों के लिए संसद में व्यवहार के लिए कोई आचार संहिता नहीं बनी हुई है किंतु उसका पूर्ण रूप से कार्यान्वन नहीं होता Iआवश्यकता है संसदीय कार्य मंत्री, दोनों सदनों के अध्यक्ष प्रधानमंत्री , नेता विपक्ष व सब बड़ी दलों के सर्दलीय नेताओं को बुलाकर महामहिम राष्ट्रपति महोदय को इस मुद्दे पर गंभीरता से आचार संहिता बनानी चाहिए साथ-साथ उनके पालन न करने पर की जाने वाली कार्यवाही पर भी सहमति बनानी चाहिए और सुनिश्चित करें कि इसका सख्ती से पालन हो I यदि इस भवन में बैठने वाले देश के भाग्य निर्माता अपने व्यवहार को कुशल नहीं कर सकते तो उनको इसमें बैठने का कोई अधिकार नहीं है I इससे तो बेहतर है कि जनता के खून पसीने से बना यह भवन किसी और कार्य में इस्तेमाल किया जाए I तथाकथित माननीय को लड़ने के लिए किसी खुले खेल ग्राउंड में छोड़ दिया जाए और उसका सीधा प्रसारण ना किया जाए I क्योंकि कभी-कभी मुझे लगता है कि सीधा प्रसारण शुरू होने के बाद से ही इनकी बदतमीजी बढ़ गई हैं क्योंकि अपने द्वारा संसद में की गई बदतमीजी को यह अपने-अपने क्षेत्र में दिखाते हैं और मूर्ख वोटरों की वाहवाही बटोरते हैं I अगर इस भवन में बैठे हुए लोगों ने देश और आज की युवा पीढ़ी के सामने कोई मिसाल नहीं पेश की तो इस भवन के निर्माण में खर्च किए गए हजारों करोड़ रुपये व्यर्थ ही माने जाएंगे I
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